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मेरे आदरणीय शिक्षक |
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एक शिक्षक और एक विद्यार्थी का सम्बंध बहुत कुछ एक माँ और एक बच्चे के समान होता है। यदि ऐसा नहीं है तो, या तो विद्यार्थी अच्छा नहीं है या फिर शिक्षक। शिक्षक का कार्य कक्षा तक ही सीमित नहीं है बल्कि उससे कहीं अधिक है। कई शिक्षकों ने मुझे विभिन्न विषय पढ़ाए। उनमें से कई अपने विषयों मे बहुत अच्छे थे किन्तु मै उनके नामों का उल्लेख इस सूची मे नहीं कर रहा हुँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मै उनका सम्मान नहीं करता परंतु यहाँ मै केवल उन्हें उल्लेखित कर रहा हूँ जिनकी मेरे जीवन पर छाप है। उन्होंने मेरे व्यक्तित्व का निर्माण किया। जो यहाँ महतपूर्ण है वह यह नहीं है कि किस प्रकार उन्होंने मुझे पढ़ाया बल्कि यह है कि किस प्रकार का व्यवहार उन्होंने मुझसे किया।
नामों के क्रम मेरी प्राथमिकताओं पर आधारित नहीं हैं अपितु वे उनके मेरे जीवन में आगमन के क्रम में है (ऊपर वाली सूची बढ़ते क्रम में और नीचे वाली सूची घटते क्रम में है)।
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उनके बारे में जैसा कि मैने My Knowledge परिशिष्ट में कहा है, कम्प्यूटर के क्षेत्र में मेरी हर सफलता के पीछे वे ही हैं। मैने सुना है कि सादगी महान लोगों का गुण होती है। वे निश्चित रूप से महान थीं(हैं)।
वे मुझे बी. एस सी. प्रथम वर्ष में 'Pascal' पढ़ाती थीं। एक बार कक्षा में उन्होंने मुझे श्यामपट पर एक समस्या हल करने को कहा और मैने वैसा ही किया किंतु उन्होंने मुझे कहा कि उसमे कुछ गलत है। जो भी हो, मैने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये कारगर है। उन्होंने इसे एक चुनौती की तरह लिया और मुझसे कहा कि मै उन्हें कम्यूटर लैब में यह कर के दिखाऊँ। कक्षा के बाद मैने उन्हें अपना प्रोग्राम दिखाया और उसने काम नहीं किया लेकिन फिर भी मैने इस बात पर ज़ोर दिया कि इसे काम करना चाहिये। वे स्टाफ रूम में चली गयीं और मैने प्रोग्राम कोड में गलतियाँ ढूँढना शुरू किया। कुछ समय बाद मैने पाया कि मेरा तरीका सही था पर गलती कहीं और थी अतः मैने उसे ठीक किया और चलाया। उसने ठीक काम किया तो मै स्टाफ रूम में गया और उन्हें लैब में बुलाया किंतु इस बार भी प्रोग्राम आशा के अनुरूप कार्य करने मे असफल रहा। वे पुनः मेरी मूर्खता पर मुस्कुराते हुए स्टाफ रूम में चली गयीं। वास्तव में, जब मै स्टाफ रूम में था तो किसी ने कोड बदल दिया था। इस बार जब प्रोग्राम ने काम करना शुरू किया तो मैने उन्हें लैब से ही पुकारा (यह एक गलत तरीका है, लेकिन मुझे डर था कि कहीं कोइ फिर से कोड बदल देगा)। उन्होंने मेरे इस तरीके का बुरा नहीं माना और लैब में आईं। जब उन्होंने प्रोग्राम को ठीक तरह से काम करता हुआ पाया तो उन्होंने उसका गहन परीक्षण किया और फिर इस कार्य को करने का एक नया तरीका बताने के लिये मुझे धन्यवाद तक दिया।
मैने इतना शान्त व धैर्यवान मष्तिष्क वाला व्यक्ति कभी नहीं देखा। उनका अहं रहित व्यक्तित्व मुझे मेरे हृदय की गहराइयों तक छू गया। कुछ वर्षों बाद जब मैने एक फिल्म "सुर" देखी तो उपरोक्त घटना मेरे मष्तिष्क में तरोताज़ा हो गई और मैने अपने notes में यह लिखा :-
हर विद्यार्थी में अपने शिक्षक से बेहतर होने की शक्ति होती है पर केवल शिक्षक में वह शक्ति होती है जिससे वह विद्यार्थी में इस शक्ति को उभार सकता है और यही इस रिश्ते के महान सौन्दर्य को दर्शाता है।-आशुतोष. {शुक्रवार, जनवरी 03, 2003}
मुझे लगता है कि सुश्री नीता मेहता में भी ये गुण थे लेकिन उस समय मै एक छोटा बच्चा था इसलिये उनके बारे में शायद ही मुझे कुछ याद हो।
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वे एक बड़े ही आनंददायी व्यक्तित्व के स्वामी हैं। विद्यार्थियों के प्रति उनका व्यवहार उल्लेखनीय है। वे हमेशा प्रत्येक विद्यार्थी पर समान व्यक्तिगत ध्यान देते थे। उनके पढ़ाने का तरीका अद्वितीय था। मुझे अभी भी याद है, किस प्रकार उन्होंने कक्षा के दरवाज़े का उपयोग जड़त्व आघूर्ण को समझाने के लिये किया था।
अभी और लिखना बाकी है...
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उन्होंने मुझे पाँचवीं कक्षा में पढ़ाया था। यद्यपि मै विद्यार्थियों के साथ सख्ती बरतने का पक्षधर नहीं हूँ पर किसी तरह उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यह काम करता है। वास्तव में एक बार मैने गणित के एक प्रश्न को गलत हल किया तो उन्होंने मुझे एक तमाचा लगाया और मुझे "मूर्खानन" कहा और मै जानता हूँ कि उस शब्द ने मुझे गणित में ५० में से ४९ अंक लाने लायक बना दिया। वे इसलिये भी महत्वपूर्ण हैं क्योकि उन्होंने ही मुझे पहली बार इतनी बड़ी सफलता का स्वाद चखाया। उस कक्षा में मैने जिले में जो उच्च स्थान प्राप्त किया उसके पीछे उन्हीं का हाथ था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सख्ती बरतना कारगर है। मेरे एक ऐसे शिक्षक भी रह चुके हैं जिनकी सख्ती ने मेरा जीवन बदतर बना दिया था। तो, जो मै कहना चाहता हूँ, वह इस दोहे के रूप में अभिव्यक्त हो सकता है:-
गुरु कुम्हार सिस कुम्भ है, गढ़ गढ़ काढ़े खोट।
भीतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट॥-संत कबीरदासजी
जिसका अर्थ है कि गुरू उस कुम्हार कि तरह है जो बाहर से तो घड़े को पीटता है पर भीतर से उसे सहारा देता है। तो जितनी सख्ती आप बरतते है उतना ही सहयोगी होना भी आवश्यक है और वे इस परिभाषा पर एकदम खरी थीं। एक सम्पूर्ण संतुलन!
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